डॉलर संकट? चीन ने 17 साल बाद तोड़ा अमेरिका का भरोसा, भारी मात्रा में सोना खरीदकर दुनिया को चौंकाया!

चीन तेजी से अपने अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स को बेच रहा है और सोने का भंडार बढ़ा रहा है। जानिए चीन के इस कदम के पीछे का असली इरादा और भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके गहरे प्रभाव।
 
De-dollarization signals for India ​Global Economic Shift 2026
चीन का 'आर्थिक वार': 17 साल के निचले स्तर पर अमेरिकी कर्ज, क्या डॉलर की बादशाहत खत्म होने वाली है?
​हाल के वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो सबसे बड़े खिलाड़ी—अमेरिका और चीन—के बीच तनाव केवल व्यापार या तकनीक तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि अब यह 'मुद्रा युद्ध' (Currency War) का रूप ले चुका है। चीन ने अपनी रणनीति बदलते हुए अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स (अमेरिकी कर्ज) को पिछले 17 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर ला दिया है। इसके विपरीत, बीजिंग तेजी से अपने सोने के भंडार (Gold Reserves) को बढ़ा रहा है।
​यह कदम न केवल अमेरिका के लिए एक चेतावनी है, बल्कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी इसमें गहरे संदेश छिपे हैं।
​चीन का इरादा क्या है?
​चीन का अमेरिकी डॉलर से दूरी बनाना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसके मुख्य कारणों को निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है:
​1. 'डी-डलराइजेशन' (De-dollarization) की नीति
​चीन दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को कम करना चाहता है। यूक्रेन युद्ध के बाद, जब अमेरिका ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को 'फ्रीज' कर दिया, तो चीन सतर्क हो गया। उसे डर है कि भविष्य में किसी विवाद (जैसे ताइवान मुद्दा) की स्थिति में अमेरिका उसके डॉलर भंडार को भी हथियार बना सकता है।
​2. आर्थिक सुरक्षा और विविधीकरण
​अमेरिकी अर्थव्यवस्था इस समय भारी कर्ज और महंगाई से जूझ रही है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों के कारण डॉलर में अस्थिरता की संभावना बनी रहती है। चीन अपने पोर्टफोलियो को विविधता देने के लिए डॉलर के बजाय सोना और अन्य संपत्तियों में निवेश बढ़ा रहा है।
​3. सोने पर भरोसा
​सोना हमेशा से सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। चीन ने पिछले कुछ महीनों में लगातार टनों सोना खरीदा है। यह दर्शाता है कि चीन अपनी मुद्रा 'युआन' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने के लिए उसे ठोस संपत्तियों का आधार देना चाहता है।
​अमेरिका के लिए बढ़ती टेंशन
​चीन कभी अमेरिका का सबसे बड़ा कर्जदाता हुआ करता था। लेकिन अब होल्डिंग्स में भारी कटौती से अमेरिका के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं:
​ब्याज दरों पर दबाव: जब चीन जैसा बड़ा निवेशक बॉन्ड बेचता है, तो अमेरिकी सरकार को नए खरीदार ढूंढने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जो उनकी अपनी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
​साख का संकट: अगर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिकी कर्ज पर भरोसा कम कर रही है, तो अन्य देश भी इसका अनुसरण कर सकते हैं।
​भारत के लिए क्या संदेश और संकेत हैं?
​भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है:
​विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन: भारत को भी यह सीखने की जरूरत है कि अपनी संपत्ति को केवल डॉलर में न रखकर सोने और अन्य मजबूत मुद्राओं में कैसे विभाजित किया जाए। RBI पिछले कुछ समय से सोने की खरीदारी बढ़ाकर पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुका है।
​रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण: चीन के इस कदम से वैश्विक व्यापार में गैर-डॉलर मुद्राओं (जैसे रुपया या युआन) के लिए जगह बन रही है। भारत को अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ रुपये में लेनदेन बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।
​सप्लाई चेन और निवेश: अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते वित्तीय तनाव के कारण कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से बाहर निकल रही हैं। 'चीन+1' रणनीति के तहत भारत इन निवेशों को आकर्षित कर सकता है।

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