मध्य प्रदेश प्रमोशन नई नीति पर 'काउंटडाउन' शुरू: 38 याचिकाओं पर 16 दिसंबर को हाई कोर्ट में होगा बड़ा फैसला!

जबलपुर हाई कोर्ट में आरक्षण-पदोन्नति मामले की निर्णायक सुनवाई, सरकार को पेश करना होगा अपना पक्ष.
 
MP Promotion New Rule
मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण (Reservation in Promotion) को लेकर विवादित मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 के भविष्य पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं। जबलपुर हाई कोर्ट की युगलपीठ ने इस मामले में दायर 38 याचिकाओं पर अगली सुनवाई की तारीख 16 दिसंबर तय की है। पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस पूरी कर ली गई है, जिसके बाद कोर्ट ने अब राज्य सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने का निर्देश दिया है। यह सुनवाई प्रदेश के हजारों कर्मचारियों के लिए प्रमोशन का रास्ता साफ करने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
​  पिछली सुनवाई का सार: याचिकाकर्ताओं ने उठाए गंभीर सवाल
​हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष हाल ही में इस मामले की 11वीं सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अपनी अधूरी बहस पूरी की और राज्य सरकार की नई प्रमोशन पॉलिसी (MP Public Service Promotion Rules, 2025) को चुनौती देते हुए कई गंभीर दलीलें पेश कीं:
​सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य 'क्वांटिफाइएबल डेटा' (ठोस आंकड़े) जुटाए बिना ही यह नीति लागू करने की तैयारी कर ली है। यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सीधा उल्लंघन है।
​असंवैधानिक नियम: दलील दी गई कि 2025 के नियम उन्हीं विवादित सिद्धांतों पर आधारित हैं जिन पर 2002 के नियम आधारित थे, और जिन्हें हाई कोर्ट पहले ही आरबी राय के मामले में समाप्त कर चुका है। इसलिए ये नियम भी असंवैधानिक हैं और इन्हें तत्काल प्रभाव से खारिज किया जाना चाहिए।
​आरक्षण प्रतिशत पर आपत्ति: याचिकाकर्ताओं ने बताया कि नई नीति में 16% और 20% प्रमोशन पर आरक्षण देने से आरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व 38% से बढ़कर 48% तक पहुँच जाएगा, जो कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सीधा उल्लंघन है।
​क्रीमी लेयर और बैकलॉग का मुद्दा: सुनवाई के दौरान क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने और बैठक पदों (Backlog Posts) को भरने के तरीके पर भी आपत्ति उठाई गई। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वास्तविक आंकड़े न होने से पिछड़े वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व का निर्धारण करना कठिन है।
​याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश कौशिक, अमोल श्रीवास्तव और डॉ. केएस चौहान जैसे वकीलों ने पक्ष रखा। हस्तक्षेपकर्ता पक्ष ने भी दलील दी कि प्रमोशन में आरक्षण देने से एक ऐसी क्लास खड़ी हो सकती है जो समानता के सिद्धांत (आर्टिकल 14 और 16) के विरुद्ध होगी।
​  16 दिसंबर को सरकार देगी जवाब
​याचिकाकर्ताओं की बहस पूरी होने के बाद, हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब राज्य सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने का निर्देश दिया है। आगामी 16 दिसंबर की सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन सहित अन्य वकील पक्ष रखेंगे।
​सरकार को इस दौरान हाई कोर्ट के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि:
​उसने आरक्षण के लिए क्वांटिफाइएबल डेटा किस आधार पर जुटाया है, और वह डेटा कोर्ट को प्रस्तुत करना होगा।
​नई प्रमोशन पॉलिसी सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांतों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप कैसे है।
​हाई कोर्ट ने इस मामले को अत्यंत जरूरी बताते हुए यह स्पष्ट किया है कि वह जल्द से जल्द सुनवाई पूरी करना चाहता है ताकि यह लंबे समय से लंबित विवाद समाप्त हो सके। कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा था कि वह पुरानी पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नई पॉलिसी के रहते कैसे लागू करेगी।
​   प्रमोशन पर लगी है रोक
​गौरतलब है कि मध्य प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट को यह आश्वासन दिया है कि कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक वह नई प्रमोशन पॉलिसी (2025) के तहत कर्मचारियों और अधिकारियों के प्रमोशन लागू नहीं करेगी। इसलिए, 16 दिसंबर को हाई कोर्ट का निर्णय या अगली सुनवाई की तिथि तय होना ही प्रदेश के लाखों सरकारी कर्मचारियों के भविष्य की दिशा तय करेगा। यदि निर्णय सरकार के पक्ष में आता है, तो वर्षों से रुका हुआ पदोन्नति का सिलसिला पुनः प्रारंभ हो सकता है।

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