मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार राज्य में सरकारी भर्तियों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला लेने की तैयारी में है। लंबे समय से विवादों और कानूनी उलझनों में रहे 'दो बच्चों की नीति' (Two-Child Norm) को अब सरकारी नौकरियों की पात्रता से हटाया जा सकता है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने प्रस्ताव तैयार कर लिया है, जिसे जल्द ही कैबिनेट की बैठक में पेश किया जाएगा।
क्या है वर्तमान नियम?
मध्य प्रदेश सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961 के अनुसार, यदि किसी उम्मीदवार की तीसरी संतान का जन्म 26 जनवरी 2001 के बाद हुआ है, तो वह सरकारी नौकरी के लिए अपात्र माना जाता है। यह नियम जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। पिछले दो दशकों में कई उम्मीदवारों को इस नियम के कारण चयन होने के बावजूद नियुक्ति से वंचित कर दिया गया या उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
क्यों लिया जा रहा है बदलाव का फैसला?
इस नियम को हटाने के पीछे कई ठोस कारण और प्रशासनिक चुनौतियां रही हैं:
कानूनी पेचीदगियाँ: हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में ऐसे कई मामले आए जहाँ उम्मीदवारों ने इस नियम को चुनौती दी। कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सरकार को पुनर्विचार के निर्देश दिए थे।
समानता का अधिकार: कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियम मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह केवल सरकारी कर्मचारियों पर लागू होता है, जबकि आम नागरिकों या अन्य क्षेत्रों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
विभागीय विसंगतियां: वर्तमान में कुछ विभागों में यह नियम सख्ती से लागू है, जबकि कुछ जगहों पर इसमें ढील दी गई है। इस विसंगति को दूर करने के लिए एक समान नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
कैबिनेट प्रस्ताव में क्या होगा?
सूत्रों के अनुसार, कैबिनेट में आने वाले प्रस्ताव में निम्नलिखित बिंदु शामिल हो सकते हैं:
अपात्रता की शर्त को पूरी तरह हटाना: भर्ती विज्ञापनों में "तीसरी संतान" वाले कॉलम को हटाया जा सकता है।
पिछली नियुक्तियों पर प्रभाव: क्या यह नियम पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से लागू होगा या भविष्य की भर्तियों के लिए, इस पर स्पष्टता कैबिनेट बैठक के बाद ही आएगी।
विभागीय जांच में राहत: वर्तमान में जो कर्मचारी इस नियम के उल्लंघन के कारण जांच का सामना कर रहे हैं, उन्हें राहत मिल सकती है।
युवाओं और कर्मचारियों पर प्रभाव
इस फैसले का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव उन युवाओं पर पड़ेगा जो काबिल होने के बावजूद केवल पारिवारिक स्थिति के कारण परीक्षा में बैठने से डरते थे।
नौकरी के व्यापक अवसर: अब अधिक उम्मीदवार प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल हो सकेंगे।
मानसिक तनाव से मुक्ति: पहले से कार्यरत कर्मचारियों को "तीसरी संतान" की जानकारी छिपाने या उसके कारण बर्खास्त होने का डर नहीं रहेगा।
प्रशासनिक सरलता: सरकार को अब भर्ती प्रक्रिया के दौरान बच्चों की संख्या के सत्यापन में अतिरिक्त ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़ेगी।
राजस्थान और अन्य राज्यों का उदाहरण
मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम पड़ोसी राज्य राजस्थान के हालिया फैसले से प्रेरित माना जा रहा है। राजस्थान सरकार ने भी हाल ही में सरकारी नौकरियों में तीसरी संतान की वजह से पदोन्नति (Promotion) रोकने के नियम को खत्म कर दिया है। इसी तर्ज पर अब एमपी सरकार भी उदार रुख अपना रही है।