मध्य प्रदेश में नई पदोन्नति नियम 2025 की कुछ धारणाओं को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि नियम के दो प्रावधान संविधान के खिलाफ हैं और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन करते हैं।
याचिका में विशेष रूप से नियम 11 और 12 को असंवैधानिक बताया जा रहा है, जिसमें पदोन्नति में संसद के आरक्षण/मेरिट संतुलन के खिलाफ फैसले शामिल हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे कई आरक्षित वर्ग के सरकारी कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
पहले की सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा था, खासकर पुराने 2002 और नए 2025 नियमों के मूल अंतर को स्पष्ट करने को कहा था। जब तक यह अंतर स्पष्ट नहीं होगा, नए नियमों पर आगामी आदेश रोक सकते हैं.
यह विवाद पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे से जुड़ा है और लगभग 4 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।
बैकग्राउंड
मध्य प्रदेश सरकार ने 2025 में नए पदोन्नति (Promotion) नियम लागू किए थे, जिनका उद्देश्य वरिष्ठता एवं अधिकारी स्थिति के आधार पर पदोन्नति व्यवस्था को संशोधित करना था।
कुछ कर्मचारी और सामाजिक कार्यकर्ता उनके खिलाफ संवैधानिक मूल्यों तथा आरक्षण सिद्धांतों के उल्लंघन का दावा कर रहे हैं।
अदालत में याचिका दायर होने के बाद मामला अब सुनवाई की मुख्य पाठ पर पहुंच चुका है।
पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका से मचा प्रशासनिक भूचाल
गलियारों में हलचल, लाखों कर्मचारियों का भविष्य दांव पर
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लागू किए गए पदोन्नति नियम 2025 (Promotion Rules 2025) एक बार फिर विवादों में घिर गए हैं। इन नियमों के दो प्रमुख प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग को लेकर जबलपुर हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई है। इस याचिका ने प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि इसका सीधा असर लाखों सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन पर पड़ सकता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि नए नियम संविधान की मूल भावना, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
कौन से नियम बने विवाद की जड़?
याचिका में Promotion Rules 2025 के नियम 11 और नियम 12 को असंवैधानिक करार देने की मांग की गई है।
इन नियमों को लेकर आरोप है कि —
ये समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं
आरक्षण और मेरिट के बीच संतुलन को तोड़ते हैं
याचिकाकर्ता के अनुसार, नए नियमों से बड़ी संख्या में कर्मचारियों को न्यायसंगत पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है।
हाई कोर्ट की सख्ती, सरकार से मांगा जवाब
मामले की प्रारंभिक सुनवाई में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार यह नहीं बताएगी कि 2002 के पुराने नियमों और 2025 के नए नियमों में मूलभूत अंतर क्या है, तब तक नए नियमों की वैधता पर सवाल बना रहेगा।
अदालत ने संकेत दिए हैं कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो नए पदोन्नति नियमों पर अस्थायी रोक भी लगाई जा सकती है।
चार लाख से ज्यादा कर्मचारी प्रभावित
प्रदेश में लगभग 4 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी इन नियमों से प्रभावित हो सकते हैं। कर्मचारियों के संगठन लंबे समय से आरोप लगाते आ रहे हैं कि नए नियमों से —
वरिष्ठ कर्मचारियों की अनदेखी हो रही है
योग्य उम्मीदवारों को नुकसान हो रहा है
आरक्षण व्यवस्था को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है
याचिका दायर होने के बाद कर्मचारी संगठनों ने भी इसे न्याय की उम्मीद बताया है।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार का कहना है कि नए नियमों का उद्देश्य पदोन्नति प्रक्रिया को पारदर्शी, तेज और विवाद-मुक्त बनाना है। सरकार का दावा है कि इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ही तैयार किया गया है।
हालांकि, हाई कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि अदालत इस तर्क से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।
क्यों इतना अहम है यह मामला?
यह मामला केवल प्रमोशन का नहीं, बल्कि —
कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों
आरक्षण नीति की संवेदनशीलता
प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता
से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि इस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं।
आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी है, जहां सरकार को अपना पूरा पक्ष रखना होगा। इस सुनवाई के बाद यह तय होगा कि Promotion Rules 2025 अपने मौजूदा स्वरूप में लागू रहेंगे या उनमें बदलाव होंगे।