भारत में 20 साल में 50% बढ़े तलाक के मामले, 58% केस में महिलाएं कर रहीं पहल

भारत में तलाक के मामलों में पिछले 20 वर्षों में 50% वृद्धि दर्ज की गई है। 58% मामलों में महिलाएं खुद पहल कर रही हैं। जानें कारण, आंकड़े और महानगरों में बढ़ती प्रवृत्ति का विश्लेषण।
 
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भारत में बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के बीच विवाह संस्था को लेकर सोच में बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है। पिछले दो दशकों में तलाक के मामलों में लगभग 50% तक वृद्धि दर्ज की गई है। खास बात यह है कि अब 58% मामलों में महिलाएं स्वयं आगे बढ़कर तलाक की पहल कर रही हैं। परिवार अदालतों और विभिन्न अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक रूप से सशक्त और शिक्षित महिलाओं का बढ़ता आत्मविश्वास, घरेलू हिंसा के प्रति असहिष्णुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चाह इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं। महानगरों में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आई है, जहां बीते तीन वर्षों में तलाक के मामलों में लगभग तीन गुना तक बढ़ोतरी दर्ज की गई।

आर्थिक स्वतंत्रता ने बदला समीकरण

विशेषज्ञों का मानना है कि कामकाजी महिलाओं की संख्या में वृद्धि और उनकी आय में स्थिरता ने विवाह में असंतोष की स्थिति को लंबे समय तक सहन करने की बाध्यता को कम किया है। पहले आर्थिक निर्भरता के कारण महिलाएं रिश्ते में रहते हुए भी मानसिक, भावनात्मक या शारीरिक पीड़ा झेलती थीं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं।

परिवार परामर्शदाताओं का कहना है कि नौकरीपेशा महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं और वे वैवाहिक जीवन में सम्मान, समानता और सुरक्षा की अपेक्षा रखती हैं। यदि उन्हें यह नहीं मिलता, तो वे कानूनी रास्ता अपनाने से नहीं हिचकिचातीं।

कौन ले रहा है तलाक?

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार तलाक लेने वाली महिलाओं की औसत आयु 31 वर्ष और पुरुषों की 36 वर्ष के आसपास है। शहरी क्षेत्रों में 25 से 34 वर्ष आयु वर्ग के बीच तलाक के मामले तेजी से बढ़े हैं। यह वह आयु है जब अधिकांश दंपती विवाह के शुरुआती 3–5 वर्षों के भीतर होते हैं और करियर, बच्चों की योजना तथा आर्थिक जिम्मेदारियों के दबाव से जूझ रहे होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं द्वारा दायर याचिकाओं का प्रतिशत अधिक रहा है। 1980 के दशक में जहां अधिकांश मामलों में पति याचिकाकर्ता होते थे, वहीं अब तस्वीर उलट चुकी है।

तलाक के प्रमुख कारण

परिवार अदालतों के डेटा और सामाजिक अध्ययनों से कुछ प्रमुख कारण सामने आए हैं:

क्रूरता (23%) – मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न।

घरेलू हिंसा (14%) – शारीरिक, आर्थिक या भावनात्मक हिंसा।

लगातार झगड़े और असहमति (11–12%)

व्यभिचार (6–7%)

परित्याग (5% के आसपास)

मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं

यौन असंगति और विवाह पूर्व धोखा

इन कारणों से स्पष्ट है कि तलाक केवल ‘असहमति’ का परिणाम नहीं, बल्कि कई बार गंभीर सामाजिक और व्यक्तिगत समस्याओं से जुड़ा होता है।

महानगरों में अधिक वृद्धि

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और लखनऊ जैसे शहरों में तलाक के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बड़े शहरों में कामकाजी जीवन की तेज रफ्तार, संयुक्त परिवारों का टूटना, व्यक्तिगत जीवन की स्वतंत्रता और डिजिटल प्रभाव भी रिश्तों पर असर डाल रहे हैं।

एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 40% विवाह पहले तीन वर्षों के भीतर ही टूट रहे हैं। इसका कारण शुरुआती अपेक्षाओं और वास्तविक जीवन की चुनौतियों के बीच का अंतर माना जा रहा है।

राज्यवार स्थिति

कुछ राज्यों में तलाक दर अपेक्षाकृत अधिक देखी गई है। महाराष्ट्र शीर्ष पर माना जाता है, उसके बाद कर्नाटक और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भारत की कुल तलाक दर अभी भी कई पश्चिमी देशों की तुलना में कम है, लेकिन वृद्धि की गति चिंता का विषय है।

सामाजिक स्वीकार्यता में बदलाव

तलाक को लेकर समाज की सोच में भी परिवर्तन आया है। पहले इसे कलंक की तरह देखा जाता था, विशेषकर महिलाओं के लिए। अब शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इसे व्यक्तिगत निर्णय के रूप में स्वीकार करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भी वैकल्पिक जीवनशैली और आत्मनिर्भरता के विचार को मजबूत किया है।

अदालतों में बढ़ता दबाव

परिवार अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है। हालांकि आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) के मामलों में वृद्धि हुई है, जिससे प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम विवादित और तेज हो रही है। कुछ अदालतों ने काउंसलिंग और मध्यस्थता की व्यवस्था को मजबूत किया है ताकि दंपतियों को अंतिम निर्णय से पहले समझौते का अवसर मिल सके।

बच्चों पर प्रभाव

तलाक का सबसे गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यदि माता-पिता परिपक्व तरीके से अलग होते हैं और बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा देते हैं, तो नकारात्मक प्रभाव कम किया जा सकता है। लेकिन लंबे विवाद और तनावपूर्ण माहौल बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं।

बदलती प्राथमिकताएं

नई पीढ़ी के लिए विवाह अब केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि साझेदारी का संबंध है। करियर, व्यक्तिगत विकास और मानसिक शांति को अधिक महत्व दिया जा रहा है। यदि विवाह इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता, तो अलग होने का निर्णय पहले की तुलना में जल्दी लिया जा रहा है।

विशेषज्ञों की राय

सामाजिक वैज्ञानिकों का मानना है कि तलाक दर में वृद्धि को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। यह महिलाओं की बढ़ती जागरूकता और असमान या हिंसक रिश्तों के प्रति असहिष्णुता का संकेत भी है। हालांकि, वे यह भी चेतावनी देते हैं कि रिश्तों में संवाद, परामर्श और पारिवारिक समर्थन को मजबूत किए बिना यह प्रवृत्ति सामाजिक ढांचे पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है।

निष्कर्ष

भारत में विवाह संस्था एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा, कानूनी जागरूकता और सामाजिक स्वीकार्यता ने तलाक को लेकर दृष्टिकोण बदला है। आंकड़े बताते हैं कि 20 वर्षों में 50% वृद्धि और 58% मामलों में महिलाओं की पहल केवल संख्याएं नहीं, बल्कि समाज में हो रहे गहरे बदलाव का संकेत हैं।

आने वाले समय में चुनौती यह होगी कि विवाह को समानता, सम्मान और संवाद पर आधारित संबंध बनाया जाए, ताकि अलगाव की नौबत कम आए और यदि आए भी तो गरिमा के साथ समाधान संभव हो सके।

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