रूसी तेल का नया ठिकाना: भारत से मुंह मोड़ चीन की ओर क्यों बढ़े मॉस्को के टैंकर?
हाल के महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जो रूसी तेल (Russian Oil) यूक्रेन युद्ध के बाद भारी छूट के कारण भारतीय बंदरगाहों की शोभा बढ़ा रहा था, अब उसका रुख धीरे-धीरे ड्रैगन यानी चीन की ओर मुड़ने लगा है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक डेटा संकेत दे रहे हैं कि मॉस्को ने बीजिंग को ऐसे लुभावने ऑफर दिए हैं, जिसने भारत के लिए 'सस्ते तेल' की रणनीति को चुनौती दे दी है।
1. भारत में रूसी तेल की गिरावट: आंकड़े क्या कहते हैं?
यूक्रेन पर हमले के बाद, पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच भारत रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा था। एक समय ऐसा था जब भारत की कुल तेल आयात का लगभग 40% हिस्सा अकेले रूस से आता था। लेकिन हालिया हफ्तों में इसमें 15% से 20% तक की गिरावट दर्ज की गई है।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
भुगतान की समस्याएं: डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं (रुपया-रुबल) में व्यापार करने में आ रही तकनीकी अड़चनें।
रसद (Logistics) की लागत: लाल सागर में बढ़ते तनाव के कारण शिपिंग और बीमा की लागत में वृद्धि।
सख्त अमेरिकी रुख: अमेरिका ने उन जहाजों और कंपनियों पर प्रतिबंध कड़े कर दिए हैं जो $60 प्रति बैरल की 'प्राइस कैप' का उल्लंघन कर रहे हैं।
2. चीन को मॉस्को का 'महा-ऑफर'
रूस ने अपनी रणनीति बदलते हुए चीन को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है, और रूस उसे खोना नहीं चाहता। मॉस्को ने बीजिंग को जो ऑफर दिए हैं, उनमें शामिल हैं:
भारी डिस्काउंट: भारत को मिलने वाली छूट कम हुई है, जबकि चीन को लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स पर बेहतर डील मिल रही है।
युआन में भुगतान: चीन के पास 'युआन' की मजबूत अंतरराष्ट्रीय पकड़ है, जिससे रूस को पश्चिमी वित्तीय प्रणाली (SWIFT) से बचने में आसानी होती है।
सीधी पाइपलाइन सप्लाई: 'पावर ऑफ साइबेरिया' जैसी परियोजनाओं के माध्यम से रूस सीधे चीन को ऊर्जा भेज रहा है, जिससे समुद्री जोखिम कम हो जाते हैं।
3. अमेरिका-भारत ट्रेड डील का प्रभाव
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच हालिया व्यापारिक विमर्श और रणनीतिक साझेदारी ने भी तेल आयात के समीकरण बदले हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी रूसी ऊर्जा निर्भरता कम करे। इसके बदले में:
अमेरिका से LNG और कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने पर बात हो रही है।
भारत अब मध्य-पूर्व (इराक, सऊदी अरब) और अमेरिका से अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो को विविधता दे रहा है ताकि किसी एक देश पर निर्भरता न रहे।