भारतीय वायुसेना के लिए ऐतिहासिक दिन
भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और सामरिक शक्ति के एक नए युग की शुरुआत हो गई है। रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) ने भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के प्रस्ताव को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह फैसला न केवल भारत की हवाई सुरक्षा को अभेद्य बनाएगा, बल्कि 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत घरेलू रक्षा विनिर्माण को वैश्विक ऊंचाइयों पर ले जाएगा। 16 जनवरी 2026 को लिया गया यह निर्णय चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत के रक्षा तंत्र के लिए एक गेम-चेंजर साबित होने वाला है।
सौदा और मंजूरी की प्रक्रिया
रक्षा सूत्रों के अनुसार, 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) की यह डील अब अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है। डीपीबी की मंजूरी के बाद, अब इस प्रस्ताव को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) के सामने रखा जाएगा। डीएसी की मुहर लगने के बाद, अंतिम वित्तीय और रणनीतिक स्वीकृति के लिए इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास भेजा जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (IGA) के तहत होगा, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहेगी और डिलीवरी में तेजी आएगी। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले महीने भारत और फ्रांस के बीच इस विशाल रक्षा सौदे पर अंतिम हस्ताक्षर हो सकते हैं।
टाटा और डसॉल्ट की साझेदारी: 'मेक इन इंडिया' का नया अध्याय
इस डील की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण मॉडल है। डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) ने भारत में राफेल के धड़ (Fuselage) और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों के निर्माण के लिए हाथ मिलाया है।
हैदराबाद में मैन्युफैक्चरिंग हब: टाटा हैदराबाद में एक अत्याधुनिक संयंत्र स्थापित कर रहा है। यहाँ राफेल के मुख्य संरचनात्मक भाग जैसे पिछला धड़, केंद्रीय भाग और अगला भाग तैयार किया जाएगा।
उत्पादन का समय: वित्त वर्ष 2028 तक पहले धड़ के हिस्से असेंबली लाइन से बाहर आने की उम्मीद है।
क्षमता: इस संयंत्र की क्षमता हर महीने दो पूर्ण धड़ (Fuselage) की आपूर्ति करने की होगी। यह पहली बार है जब कोई निजी भारतीय कंपनी वैश्विक स्तर के लड़ाकू विमान के इतने महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण करेगी।
भारतीय वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है यह डील?
वर्तमान में भारतीय वायुसेना अपने बेड़े में विमानों की घटती संख्या (Squadron Strength) की चुनौती से जूझ रही है। वायुसेना को दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर एक साथ युद्ध की स्थिति में कम से कम 42 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है, जबकि अभी यह संख्या काफी कम है।
तकनीकी श्रेष्ठता: राफेल एक 4.5 पीढ़ी का लड़ाकू विमान है जो लंबी दूरी की मिसाइलों (Meteor), स्कैल्प (SCALP) और हैमर (HAMMER) जैसे हथियारों से लैस है।
रणनीतिक संतुलन: लद्दाख और पूर्वोत्तर सीमाओं पर चीन की बढ़ती हवाई सक्रियता को देखते हुए 114 नए राफेल विमान भारत को जबरदस्त बढ़त दिलाएंगे।
नौसेना और वायुसेना का तालमेल: भारत पहले ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन विमानों का सौदा कर चुका है। वायुसेना के पास 114 और राफेल होने से प्रशिक्षण, रख-रखाव (Maintenance) और स्पेयर पार्ट्स के प्रबंधन में आसानी होगी।
अर्थव्यवस्था और रोजगार पर प्रभाव
यह डील केवल रक्षा तक सीमित नहीं है। टाटा और डसॉल्ट की इस साझेदारी से भारत में हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को सप्लाई चेन का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा, जिससे भारत एक वैश्विक एयरोस्पेस हब के रूप में उभरेगा।
निष्कर्ष: भविष्य की ओर भारत
114 राफेल विमानों की यह मंजूरी भारत के "शक्तिशाली भारत" बनने के संकल्प को दोहराती है। फ्रांस के साथ प्रगाढ़ होते रक्षा संबंध और टाटा जैसी कंपनियों का रक्षा क्षेत्र में आगे आना यह दर्शाता है कि भारत अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि निर्माता बनने की दिशा में मजबूती से बढ़ रहा है।