Rupee at record low: RBI भी न रोक पाया! रुपए में भारी गिरावट, एक डॉलर 90 की दहलीज पर
Rupee at record low: मजबूत अमेरिकी डॉलर, बढ़ता व्यापार घाटा और विदेशी निवेश की निकासी ने बढ़ाया संकट; RBI की दखलंदाजी और आगामी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर टिकी निगाहें।
Tue, 2 Dec 2025
Rupee at record low: भारतीय रुपया एक बार फिर इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिसने देश के आर्थिक गलियारों में चिंता की लहर पैदा कर दी है। मंगलवार को रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹89.95 का नया ऐतिहासिक निचला स्तर छू लिया, और इंटर-बैंक ऑर्डर मैचिंग सिस्टम में यह संक्षिप्त रूप से ₹90 प्रति डॉलर के महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर गया। हालांकि बाद में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के संभावित हस्तक्षेप के कारण कुछ नुकसान की भरपाई हुई और रुपया ₹89.87 पर बंद हुआ, लेकिन 90 के निशान के इतना करीब आना बाजार की अस्थिरता को दर्शाता है।
साल 2025 में अब तक भारतीय करेंसी में 4% से अधिक की गिरावट आ चुकी है, जिसने इसे एशियाई मुद्राओं में सबसे कमजोर बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये पर दबाव कई घरेलू और वैश्विक कारकों का परिणाम है।
गिरावट के प्रमुख कारण:
अमेरिकी डॉलर की मजबूती: अमेरिकी अर्थव्यवस्था से आए मजबूत नौकरी के आंकड़े और अन्य सकारात्मक आर्थिक संकेतों के कारण यह उम्मीद कम हो गई है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) जल्द ही ब्याज दरों में कटौती करेगा। ऊंची ब्याज दरें अमेरिकी डॉलर को आकर्षक बनाए रखती हैं, जिससे विदेशी निवेशक डॉलर-केंद्रित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं और रुपये पर दबाव बढ़ता है।
विदेशी पूंजी की निकासी (FII Outflows): विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से लगातार पूंजी निकालना जारी रखा है। अगस्त के अंत में अमेरिका द्वारा भारतीय सामान पर उच्च टैरिफ लगाए जाने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से $16.5 बिलियन से अधिक की निकासी की है। यह भारी निकासी डॉलर की मांग को बढ़ाती है और रुपये को कमजोर करती है।
बढ़ता व्यापार घाटा: अक्टूबर माह में रिकॉर्ड व्यापार घाटा दर्ज किया गया, जो उच्च आयात के कारण हुआ। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं के महंगे होने से आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। आयातकों से डॉलर की मजबूत मांग ने भी रुपये पर निरंतर दबाव बनाए रखा है।
अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में देरी: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की पहली किस्त में देरी को भी रुपये की कमजोरी के प्रमुख उत्प्रेरकों में से एक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापार सौदे पर अनिश्चितता से निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है।
RBI की भूमिका और बाजार का दृष्टिकोण:
बाजार विश्लेषक लगातार RBI की भूमिका पर नज़र बनाए हुए हैं। कोटक सिक्योरिटीज के कमोडिटी और करेंसी प्रमुख अनंद्य बनर्जी ने कहा, "₹90 का स्तर एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक बाधा है। RBI के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह 90 के नीचे सक्रिय रहे। यदि यह जोड़ी इस क्षेत्र से ऊपर टिकना शुरू कर देती है, तो बाजार तेजी से ₹91.00 या उससे भी अधिक की ओर बढ़ सकता है।" उनका मानना है कि केंद्रीय बैंक को सटोरियों को एकतरफा रुझान के साथ बहुत सहज होने से रोकना होगा, क्योंकि इससे USD-INR अस्थिरता में अनावश्यक उछाल आ सकता है।
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री अदिति गुप्ता के अनुसार, रुपये का निकट अवधि में कमजोर रहने का अनुमान है, और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते से जुड़ी कोई भी खबर मुद्रा की दिशा में बड़ा बदलाव लाने वाली मुख्य उत्प्रेरक होगी। उन्होंने दिसंबर के लिए USD/INR को ₹89-₹90 के दायरे में कारोबार करने का अनुमान लगाया है।
बाजार की नजरें अब 3 से 5 दिसंबर तक होने वाली RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर टिकी हैं, जिससे रुपये के भविष्य के प्रक्षेपवक्र पर स्पष्ट रुख मिलने की उम्मीद है। मजबूत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर और रुपये के गिरते मूल्य को देखते हुए, कुछ अर्थशास्त्री दरों में यथास्थिति की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि अन्य कम मुद्रास्फीति के कारण 25 आधार अंकों की दर में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं।
प्रभाव और आगे की राह:
रुपये की ऐतिहासिक कमजोरी का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। आयातित वस्तुएं, जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और सबसे महत्वपूर्ण कच्चा तेल, महंगे हो जाते हैं, जिससे घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति बढ़ती है। इसके अलावा, विदेश में पढ़ने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों के लिए भी खर्च बढ़ जाता है। एक तरफ जहां रुपये की गिरावट जारी है, वहीं सोने और चांदी की कीमतें अपने नए रिकॉर्ड उच्च स्तर पर कारोबार कर रही हैं, हालांकि उनमें कुछ मुनाफावसूली भी देखी गई है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आगामी भारत यात्रा के संदर्भ में, रुपये के लगातार मूल्यह्रास ने डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को भी बल दिया है। भारत और रूस जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ डॉलर-केंद्रित वैश्विक व्यापार व्यवस्था से स्वतंत्र एक वित्तीय तंत्र बनाने की कोशिश कर रही हैं। रुपये के 90 के स्तर पर पहुँचने से आयात महंगा हुआ है, जो डॉलर की अनदेखी करने के लिए भारत और रूस दोनों के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है।
कुल मिलाकर, भारतीय रुपया इस समय एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। RBI का हस्तक्षेप, विदेशी निवेश का प्रवाह, वैश्विक आर्थिक रुझान और आगामी व्यापारिक समझौतों की प्रगति—ये सभी कारक मिलकर तय करेंगे कि रुपया ₹90 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करता है या वर्तमान अस्थिरता से उबरकर स्थिरता की ओर बढ़ता है। बाजार में भारी उतार-चढ़ाव की आशंका है और निवेशकों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
