अमेरिका बनाम ईरान युद्ध: कौन सा देश किसके साथ? जानें पूरी लिस्ट और भारत पर प्रभाव

2026 के अमेरिका-ईरान संघर्ष ने दुनिया को दो हिस्सों में बाँट दिया है। जानें रूस, चीन, इजरायल और भारत का स्टैंड और इस महाजंग के वैश्विक परिणाम।
 
​World War 3 possibilities 2026 ​India's stand on US-Iran conflict

पश्चिम एशिया (Mid-East) इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए 'सर्जिकल स्ट्राइक' और उसके बाद ईरान के जवाबी हमलों ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबरों के बाद यह संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि एक 'वैश्विक ध्रुवीकरण' का रूप ले चुका है।

​इस महाजंग में दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी रणनीतिक जरूरतों और पुरानी दोस्ती के आधार पर दो खेमों में बँटते नजर आ रहे हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस युद्ध में कौन किसके पाले में खड़ा है।

​1. अमेरिकी खेमा: 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' के समर्थक

​अमेरिका ने इस हमले को 'आत्मरक्षा' और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने की कोशिश बताया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम को कई पश्चिमी और क्षेत्रीय सहयोगियों का मौन या खुला समर्थन प्राप्त है।

​इजरायल: इस युद्ध में अमेरिका का सबसे करीबी और सक्रिय भागीदार। इजरायली वायुसेना ने अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों (Fordow और Natanz) पर हमले किए हैं।

​यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और फ्रांस (E3): हालांकि ये देश कूटनीतिक समाधान चाहते थे, लेकिन ईरान द्वारा परमाणु समझौते के उल्लंघन के बाद इन्होंने 'स्नैपबैक' प्रतिबंधों का समर्थन किया है और अमेरिका के सुरक्षा चिंताओं को जायज ठहराया है।

​कनाडा और ऑस्ट्रेलिया: इन देशों ने खुले तौर पर अमेरिका के इस कदम का समर्थन करते हुए इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया है।

​खाड़ी देश (सऊदी अरब, यूएई, बहरीन): ये देश रक्षात्मक रूप से अमेरिका के साथ हैं। हालांकि वे सीधे युद्ध में शामिल नहीं होना चाहते, लेकिन उनके सैन्य अड्डों का उपयोग अमेरिकी सेना कर रही है। ईरान के जवाबी हमलों ने इन्हें और अधिक अमेरिकी खेमे की ओर धकेल दिया है।

​2. ईरान का 'प्रतिरोध का अक्ष' (Axis of Resistance)

​ईरान भले ही सैन्य रूप से अमेरिका से कमजोर दिखे, लेकिन उसका प्रॉक्सी नेटवर्क और रणनीतिक साझेदार उसे एक मजबूत स्थिति में रखते हैं।

​रूस: मॉस्को ने अमेरिका और इजरायल के हमलों की तीखी निंदा की है। रूस के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण सैन्य सहयोगी है (विशेषकर ड्रोन और मिसाइल तकनीक में)। रूस इसे अमेरिका द्वारा 'शासन परिवर्तन' (Regime Change) की एक अवैध कोशिश मान रहा है।

​चीन: बीजिंग ने "संयम" की अपील तो की है, लेकिन पर्दे के पीछे वह ईरान का सबसे बड़ा आर्थिक मददगार है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से चीन की ऊर्जा आपूर्ति खतरे में है, इसलिए वह अमेरिकी कार्रवाई का विरोध कर रहा है।

​हिजबुल्लाह (लेबनान): ईरान का सबसे वफादार और शक्तिशाली गैर-राज्य सहयोगी। खामेनेई की मौत के बाद हिजबुल्लाह ने इजरायल पर हजारों मिसाइलें दागकर युद्ध का दूसरा मोर्चा खोल दिया है।

​हूती विद्रोही (यमन): लाल सागर में अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाकर हूती ईरान के पक्ष में दबाव बना रहे हैं।

​3. भारत की स्थिति: 'संतुलन की चुनौती'

​भारत के लिए यह स्थिति सबसे अधिक जटिल है। भारत का अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन है, तो ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध और चाबहार बंदरगाह जैसे आर्थिक हित।

​चिंता: होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत का 50% कच्चा तेल आता है। तनाव बढ़ने से भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

​स्टैंड: भारत ने किसी का पक्ष लेने के बजाय 'संवाद और कूटनीति' की अपील की है। भारत की प्राथमिकता खाड़ी देशों में रह रहे अपने लाखों नागरिकों की सुरक्षा है।

​4. युद्ध का वैश्विक प्रभाव: क्या होगा आगे?

​यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद कर देता है, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई रुक जाएगी, जिससे वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है। यह युद्ध अब केवल जमीन पर नहीं, बल्कि साइबर स्पेस और वैश्विक अर्थव्यवस्था के गलियारों में भी लड़ा जा रहा है।

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